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किसे पाना मुनासिब है , किसे बेहतर गंवाना है / राजेन्द्र स्वर्णकार

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किसे पाना मुनासिब है , किसे बेहतर गंवाना है
इधर महबूब है ऐ दिल , इधर सारा ज़माना है

जली है शम्मा-ए-उल्फ़त , रोशनी ख़ुद मुस्कुराएगी
सभी तारीक़ियों को शर्तिया जाना ही जाना है

मुझे उसने क़बूला , मैं उसे तस्लीम करता हूं
ये क़ाज़ी कौन होता है, किसे कुछ क्या बताना है

यहां मत ढूंढना मुझको, यहां अब मैं नहीं रहता
यहां रहता मेरा दिलबर, ये दिल उसका ठिकाना है

ज़हर पीना पड़ेगा आप गर सुकरात बनते हो
अगर ईसा बनोगे ख़ुद सलीब अपनी उठाना है

गिले-शिकवों से रंज़िश-बैर से मत यार, भर इसको
ये दिल है या कोई ख़ुर्जी है , कोई बारदाना है

नहीं अपना कोई भी या पराया भी नहीं कोई
चलो राजेन्द्र छोड़ो क्या किसी को आज़माना है