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किस बीज से कैसा शजर इस बार हो पैदा / रवि सिन्हा

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किस बीज से कैसा शजर[1] इस बार हो पैदा
रिश्ते जहाँ बोवें वहीं दीवार हो पैदा

अपनों की दुनिया में ग़मो-अन्दोह[2] की खेती
कुछ कर कि ग़ैरों में भी अब आज़ार[3] हो पैदा

तारीख़[4] गर नासेह[5] है महफ़िल में जाहिल की
इमरोज़[6] में दीरोज़[7] की तलवार हो पैदा

मिट्टी में भी कुछ बात हो दहक़ाँ[8] भी हो शातिर
जम्हूरियत में ज़ुल्म की सरकार हो पैदा

शब्दार्थ
  1. पेड़ (tree)
  2. दुःख और पीड़ा (grief and sorrow)
  3. बीमारी (disease)
  4. इतिहास (history)
  5. उपदेशक (preacher)
  6. आज का दिन (today)
  7. बीता हुआ कल (yesterday)
  8. किसान (peasant)