भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

कीमोथेरेपी / मृत्युंजय

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

मेरा शरीर एक देश है
सागर से अम्बर तक, पानी से पृथ्वी तक
अनुभव जठराग्नि के खेत में झुकी हुई गेहूँ की बाली

मेरे हाथ, मेरा दिल, मेरी जुबान
मेरी आँखें, त्वचा और जाँघें सब
अब इतनी हसरत से ताकते हैं मेरी ओर
कि जी भर आता है
इन्हीं में तुम्हारे निशान हैं सर्द-सख़्त
इसी ठौर दिल है
लदा-फदा दुख और इच्छा से मोह से बिछोह से

सिर्फ साधन नहीं है मेरी देह,
न सिर्फ ओढ़ने की चादर
मुझे इससे बहुत, बहुत इश्क़ है

इसी घर के साये में
कोई बैठा है चुपचाप
अपना ही, लगाए घात
छोटा सा,
बामुलाहिजा अदब के साथ,
इन्तज़ार करता हुआ वाजिब वक़्त का
यहाँ सज सकती हैं अक्षौहिणी सेनाएँ
निरापद इश्क़ का यह अड्डा कब समरभूमि में बदल जाएगा
यह सिर्फ़ दुश्मन ही जानता है
दुश्मन ही जानता है
हमारे इस तन्त्र की सबसे कमज़ोर कड़ी
और ठीक इसीलिये हमले का वक़्त

यह एक समरभूमि है
यहाँ लाख नियम एक साथ चलते हैं
व्यूह भेद की लाख कलाएँ
लाखों मोर्चे एक ही वक़्त में एक ही जगह पर खुले रहते हैं
एक दूसरे से गुँथे
सँगति में

असँगति के समय
दाहिने हाथ की बात नहीं सुनता बायाँ हाथ
पैर और सर आपस में जूझ जाते हैं
सांसें कलेजे से
आँखें अन्दर ही उतरती चली जाती हैं
मांसपेशियाँ शिराओं से अलग हो जाती हैं
रात का शरीर एक विशाल कमलकोष है
जिससे छूट पड़ना चाहता है भौंरा

युद्धभूमि में सामने खड़े हो गए हैं लड़ाके
प्रतिशोध की आग धधककर निर्धूम हो चुकी
साम-दाम और दण्ड-भेद से
जीते जा रहे हैं गढ़ एक के बाद एक
समर्पण हो रहे हैं
अन्दर ही होती जाती है भारी उथल-पुथल

ईश्वर की स्मृति से लेकर समाधि तक के सारे
उपाय सब घिसकर
चमकाए जा चुके
आजमाए जा चुके

भरे हुए हाथों में थाम मुट्ठीभर दवाएँ
बाहरी इमदाद के भरोसे
हूँ हूँ हूँ
बजती हुई रणभेरी
देरी नहीं है अब
आते ही होंगे वे सर्ज़क / सर्जन

सोडियम क्लोराइड के द्रव और
आक्सीजन गैस का दबाव बढ़ाते
विशेषज्ञ आए
मलबे के बोझ से सिहर रहा है विचारतन्त्र
लम्बी सिरिंजों पर लाभ का निशान चटख
डालीं गईं लम्बी और पतली नलिकाएँ
दुश्मनों के गढ़ तक पहुँचने की ख़ातिर
घर में आहूत हुए भस्मासुर
नज़र तनिक फिरी नहीं कि गोली चली नहीं
मेरे भीतर मेरी ही लाशें भरी हैं
बावन अँगुल की बावन लाशें

इतने सबके बाद भी
फिर-फिर पलट पड़ता है हत्यारा खेल
शरीर के भीतर ही बर्बर नरसंहार
दुश्मन से लड़ने के
आदिम सलीके से
पूरा-पूरा नगर जला दिया
वानरों ने
पूरा वन-प्रान्तर, गिरि-खोह सब कुछ उजाड़ दिया
अँखुवाई धरती भी वृक्षों सँग जल मरी

लाख बेगुनाहों की क़ीमत पर
पकड़ा गया है सम्भावित गुनाहगार
तन्त्रों से, यन्त्रों से, अधुनातम मन्त्रों से

आँखें मुन्दी-मुन्दी ही हैं
फेफड़े तक कोई सांस, टूट-टूट आती है
छूट-छूट जाती है हर लम्हा एक बात
त्वचा में भर रही है, गाढ़ी और गहरी रात
बहुत-बहुत धीरे-धीरे बढ़ रहा हूँ मैं
इस निर्मम जँगल से निकाल मुझे घर ले चलो, माँ !

कीमोथेरेपी[1] की इस समरगाथा में
कटे-फटे टुकड़े मनुष्यता के
पूँजी की भव्य-दिव्य निर्ज़ल चट्टानों पर
यही कथा
रोज़ रोज़ दुहराई जाती है
साक्षी हूँ मैं...

शब्दार्थ
  1. कीमोथेरेपी कैंसर के इलाज़ की एक विधि है। इसमें कैंसरग्रस्त कोशिकाओं को बाह्य दवाओं के जरिए मारा जाता है। इलाज की इस प्रक्रिया से शरीर पर काफ़ी बुरे असर पड़ते हैं, क्योंकि इससे प्रभावित कोशिकाओं के साथ सामान्य कोशिकाओं को भी क्षति पहुँचती है।