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कुकुरमुत्ता / कविता भट्ट

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आज उगा है
उपवन- कोने में
कुकुरमुत्ता
चाँद- सा मुस्कुराता
जीवन -राग
गीत गुनगुनाता
उसी कोने में,
जहाँ फेंक देते थे
झूठन-कूड़ा
जो भी था उपेक्षित
हमेशा से ही
न तराई-निराई।
आशा-संघर्ष
प्रकृति -प्रदत्त है
जिजीविषा भी
निस्सार संसार में
दृढ़ होकर
कुकुरमुत्ते से ही
सीखना मुझे
बनाना हमेशा ही
उपेक्षित को
अपेक्षित और हाँ
उस गीत का
 व स्वर लहरी का
करें अभ्यास
कि प्रकृतिजन्य जो,
 नहीं होता है
कुछ अनुपयोगी
बन जाता है
आरोह तक जाते
जीवन -मृदु गीत
-०-