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कुछ ऐसा ही / निकानोर पार्रा / उज्ज्वल भट्टाचार्य

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पार्रा ठहाके लगाता है
मानो कि उसे नर्क भेजा जा रहा है
लेकिन कवि कब ठहाके नहीं लगाते हैं ?
कम से कम वह ऐलान करता है
कि वह ठहाके लगा रहा है ।

वे उम्र गुज़ार देते हैं
उम्र गुज़ार देते हैं
कम से कम लगता है कि वे गुज़ारते हैं
hypothesis non fingo[1]
सब कुछ यूँ होता रहता है मानो वे गुज़ार रहे हैं

अब वह रोने लगता है
यह भूलकर कि वह अकवि है ।

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दिमाग लड़ाना बन्द करो,
कविता आजकल कोई नहीं पढ़ता,
इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता
कि वह अच्छी है या बुरी ।

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मेरी ओफ़ेलिया
मेरी चार कमज़ोरियों को
माफ़ नहीं करेगी :
 मेरा बुढ़ापा
मेरी बेकार ज़िन्दगी
कि मैं कम्युनिस्ट बन गया
और मुझे राष्ट्रीय साहित्य पुरस्कार मिला है ।

’मेरा परिवार शायद माफ़ कर दे
मेरी पहली तीन कमज़ोरियाँ
लेकिन आख़िरी वाली वह भी कभी माफ़ नहीं करेगा’ ।

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मेरी लाश और मैं
एक-दूसरे को बख़ूब समझते हैं ।

मेरी लाश पूछती है : तुम भगवान को मानते हो ?
और मैं दिल खोलकर कहता हूँ — नहीं, बिल्कुल नहीं ।
मेरी लाश पूछती है : क्या तुम सरकार को मानते हो ?
और मैं जवाब में हंसिया-हथौड़ा उठा लेता हूँ ।
मेरी लाश पूछती है : क्या तुम पुलिस को मानते हो ?
और मैं उसके चेहरे पर एक मुक्का जड़ देता हूँ ।
फिर वह ताबूत से बाहर निकल आती है,
और हम बाँहों में बाँह डाले वेदी तक पहुँचते हैं ।

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दर्शनशास्त्र की असली समस्या यह है —
थाली कौन धोएगा ?

 ये कोई आध्यात्मिक मसले नहीं हैं —

ईश्वर
सत्य
अनित्यता
बेशक

लेकिन सबसे पहले,
थाली कौन धोएगा ?

जो भी धोना चाहता हो, आगे बढ़े
फिर मिलेंगे, जानेमन !
और हम फिर बन जाते हैं दुश्मन ।

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होमवर्क —
एक सॉनेट लिखो
जिसकी शुरुआत पाँच चरणों के इस छन्द से हो :
मैं तुमसे पहले मरना चाहूँगा
और जिसके अन्त में यह पँक्ति हो :
मैं चाहूँगा कि तुम्हारी मौत पहले हो ।

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पता है क्या हुआ
जब मैंने घुटने टेके हुए थे
सलीब के सामने
उसके घाव देखते हुए ?

मुस्कराते हुए उसने मुझे आँख मारी !

पहले मैं सोचता था वह कभी नहीं हंसता
लेकिन अब तो मुझे यक़ीन हो गया है ।

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एक जर्जर बुड्ढा आदमी
अपनी प्यारी माँ के ताबूत पर
बिखेरता है लाल कार्नेशन के फूल

तुम सुन रहे हो, देवियो और सज्जनो  !
वाइन पीने का आदी एक बूढ़ा
अपनी माँ के मक़बरे पर बमबारी करता है
लाल कार्नेशन की माला फेंककर

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धर्म की ख़ातिर मैंने
खेलना-कूदना छोड़ दिया
(हर इतवार मैं प्रार्थना-सभा में जाने लगा)
 
कला की ख़ातिर मैंने
धर्म छोड़ दिया
गणित की ख़ातिर मैंने
कला को छोड़ दिया

और अन्त में प्रबोधन का शिकार हुआ

और अब मैं ऐसा हूँ
जो सिर्फ़ गुज़रता है
समूचे या उसके हिस्सों में
जिसे यक़ीन नहीं ।

अँग्रेज़ी से अनुवाद : उज्ज्वल भट्टाचार्य

शब्दार्थ
  1. मेरा कोई अनुमान नहीं (न्यूटन)