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कुहरे-कुहासों का देश / अनिल अनलहातु

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क्या आपको नहीं लगता कि
यह पूरा देश कुहरे
और कुहासों से भरा है ?

यहाँ हर चीज़
अस्पष्ट और धुन्धली
दिख पड़ती है,
क्या आपको नहीं लगता कि
यहाँ के लोग इसी धुन्धलेपन के ‘शिकार’
अभ्यस्त हैं,
यहाँ हर चीज़
एक पारभासक शीशे में
क़ैद है ?

क्या आपको नहीं लगता कि
यह भैंगी चिपचिपी आँखों वाले
लोगों का देश है,
कि यहाँ के लोग
आधी-अधूरी चीज़ों को
देखने के अभ्यस्त हैं ।

क्या आपको नहीं लगता कि
चीड़ और देवदार के ये
लम्बे और चिकने पेड़
और सुन्दर, अच्छे लगते
यदि यह कुहरा-कुहासा हट जाता ।

क्या आपको नहीं लगता कि
आप अन्धों के संसार में आने वाले
नुनेज़[1] हैं
कि उजाले की दुनिया के बारे में बताना
एक निहायत ही बेतुकी और बेहूदी बात थी
कि आपकी भी
आँखें निकालने का सुझाव था
ताकि आप भी इनकी ही तरह
कुहरे और कुहासे को
अपनी ज़िन्दगी में उतार लें ।

शब्दार्थ
  1. एच०जी० वेल्स की कहानी 'द कण्ट्री आफ़ द ब्लाइण्ड' का मुख्य पात्र