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केकर रोवले गँगा बही गेल, केकर रोवले समुन्दर हे / मगही

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मगही लोकगीत   ♦   रचनाकार: अज्ञात

केकर[1] रोवले गँगा बही गेल, केकर रोवले समुन्दर हे।
केकर रोवले भिजलइ चदरिया, केकर अँखिया न लोर[2] हे॥1॥
अम्माँ के रोवले गँगा बही गेल, बाबूजी के रोवले समुन्दर हे।
भइया के रोवले भिंजले चदरिया, भउजी के अँखिया न लोर हे॥2॥
कवन कहल बेटी रोज रोज अइहें, कवन कहले छव मास हे।
कवन कहले भउजी काज परोजन[3] कवन कहले दूरि जाहु[4] हे॥3॥
अम्माँ कहले बेटी रोज रोज अइहें, बाबूजी कहले छव मास हे।
भइया कहले बहिनी काज परोजन, भउजी कहलन दूरि जाहु हे॥4॥
का तोरा भउजी हे नोन[5] हाथ देली, न देली पउती[6] पेहान[7] हे।
का तोरा भउजी हे चूल्हा चउका रोकली, काहे कहल दूरि जाहु हे॥5॥

शब्दार्थ
  1. किसके
  2. आँसू
  3. उत्सव, समारोह, कार्य-विशेष पर
  4. जाओ
  5. नमक
  6. सींक की बनी हुई ढक्कनदार पिटारी
  7. ढक्कन