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केतना कदम के डार हम रहनी अगोर के / अर्जुन कुमार सिंह 'अशांत'

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केतना कदम के डार हम रहनी अगोर के
तबहूँ तोहार बाँसुरी बाजल न भोर के

कब तक घिरल अन्हार में कलपत रही करेज
कब तक सनेह के किरिन उतरी अंजोर के ?

जब तक तोहार प्रान में नइखे दरद के मोल
हम का करब ई आँखि में मोती बटोर के ?

खोंता हमार प्यार के दिहल सदा उजाड़
दिहल ढकेल पांक में बहियाँ ममोर के

अइसे तोहार चाल ई बाटे बहुत पुरान
जाल छटक करेज के कनखा खंखोर के

तबहूँ दिया उमेद के बाटे जरत ‘अशान्त’
कबहूँ त पंख प्रान ई थिरकी नू भोर के