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केसरिया बालमवा... पधारो म्हारे देस... / राजीव रंजन प्रसाद

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केसरिया बालमवा..
पधारो म्हारे देस[1]...

आदम ढूंढो, आदिम पाओ
रक्त पिपासु, प्यास बुझाओ
मेरी माँगें, तेरी माँग
खींचे इसकी उसकी टाँग
मेरा परिचय, मेरी जाति
छलनी कर दो दूजी छाती
नेताजी का ले कर नारा
गुंडागर्दी धर्म हमारा
हमें रोकने की जुर्रत में
खिंचवाने क्या केस[2]
पधारो म्हारे देस..

किसका ज़्यादा चौड़ा सीना
मैं गुज्जर हूँ, वो है मीणा
दोनों मिल कर आग लगाएँ
रेलें रोकें बस सुलगाएँ
कितना अपना भाईचारा
मिलकर हमने बाग उजाड़ा
बीन जला दो, धुन यह किसकी
भैंस उसी की लाठी जिसकी
मरे बिचारे आम दिहाड़ी
गोली के आदेस[3]
पधारो म्हारे देस..

ईंट-ईंट कर घर बनवाओ
जा कर उसमें आग लगाओ
और अगर ऐसा कर पाओ
हिम्मत वालो देश जलाओ
अपनी पीड़ा ही पीड़ा है
भीतर यह कैसा कीड़ा है
अपनी भी देखो परछाई
निश्चित डर जाओगे भाई
बारूदों में रेत बदल दी
इसी काज के क्लेस[4]
पधारो म्हारे देस...

जाग-जाग शैतान जाग रे
आग-आग हर ओर आग रे
जला देश परिवेश नाच रे
झूम-झूम आल्हे को बाँच रे
इंसानों की मौत हो गई
सोच-सोच की सौत हो गई
होली रक्त चिता दीवाली
गुलशन में उल्लू हर डाली
हँसी सुनों, हैं सभी भेड़िये
इंसानों के भेस[5]
पधारो म्हारे देस...

केसरिया बालमवा.........!!!

शब्दार्थ
  1. देश
  2. केश, बाल
  3. आदेश, हुक़्म
  4. क्लेश, लड़ाई
  5. भेष