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कैसे पता हो मेरा, ये दर्दे-दिल किसी को / सूरज राय 'सूरज'

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कैसे पता हो मेरा, ये दर्दे-दिल किसी को।
देखा है तुमने बहते क्या रेत की नदी को॥

तेरी ख़ुशी की ख़ातिर ठोकर पर रक्खी दुनिया
तूने ख़ुशी की ख़ातिर ठुकरा दिया मुझी को॥

अंधों को भी पता है घर बेइमानियों का
ईमां के घर का रस्ता मालुम नहीं किसी को॥

दुनिया की ख़ूबियों ने सजदा किया है उसको
ख़़ूबी बना ली जिसने, अपनी हर इक कमी को॥

ऐ मौत मेरी तुझको हो जन्मदिन मुबारक
तोहफ़े में देने लाया मैं तुझको ज़िंदगी को॥

मुझको क़सम है तेरे एक-एक चीथड़े की
तारों से टांक दूंगा माँ तेरी ओढ़नी को॥

वो जानबूझ कर ही चाबी गिरा गया था
मेरे ज़मीर ने ही खोला न हथकड़ी को॥

सौ बार दुश्मनी ने पूछा मेरा ठिकाना
कैसे पता बताता घर का इक अजनबी को॥

मैं नींद की फ़ि रौती रातों को दे रहा हूँ
यादों के मुजरिमों ने अगवा किया ख़ुशी को॥

सौ झूठ थे सभी के, झुठला सके न इक सच
इक सच था मेरा जिसने झुठला दिया सभी को॥

रस्मो-रिवाज़ो-बंदिश, हों बंदिशें तुम्हारी
हमने तो आईने-सा देखा है शायरी को॥

मेरे लिये ज़रूरी है, रब भी आदमी भी
मज़हब बचाए किसको रब को या आदमी को॥

कांधे पर इक दिये के सर रखके कोई "सूरज"
कहता है क़सम तेरी, तरसा हूँ रोशनी को॥