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कोई भी ज़ोर ख़रीदार पर नहीं चलता / रऊफ़ खैर

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कोई भी ज़ोर ख़रीदार पर नहीं चलता
कि कारोबार तो अख़बार पर नहीं चलता

हम आप अपना गिरेबान चाक करते हैं
हमारा बस ही तो सरकार पर नहीं चलता

कुछ और चाहिए तस्कीन-ए-जिस्म-ओ-जाँ के लिए
हमारा काम तो दीदार पर नहीं चलता

मैं जानता हूँ मुझे किस का साथ देना है
मैं बिल्ली बन के तो दीवार पर नहीं चलता

उसूल जितने हैं लागू हमीं पे होते हैं
और एक यार-ए-तरह-दार पर नहीं चलता

उन्हें लिहाज़ नहीं है जो मेरी म़र्जी का
तो मैं भी मर्ज़ी-ए-अग़्यार पर नहीं चलता

न जाने कब तुम्हें औक़ात अपनी दिखला दे
अब इतना जुल्म भी नादार पर नहीं चलता

मिरे सुख़न का बहाना है क़ाफिया ओ रदीफ़
मैं शेर कहता हूँ कुछ तार पर नहीं चलता

रऊफ़ ‘ख़ैर’ पहुँचता वहीं है हिर-फिर कर
कि इख़्तियार दिल-ए-ज़ार पर नहीं चलता