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कोई हलचल है न आहट न सदा है कोई / ख़ुर्शीद अहमद 'जामी'

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कोई हलचल है न आहट न सदा है कोई
दिल की दहलीज़ पे चुप-चाप खड़ा है कोई

एक इक कर के उभरती हैं कई तस्वीरें
सर झुकाए हुए कुछ सोच रहा है कोई

ग़म की वादी है न यादों का सुलगता जंगल
हाए ऐसे में कहाँ छोड़ गया है कोई

याद-ए-माज़ी की पुर-इसरार हसीं गलियों में
मेरे हम-राह अभी घूम रहा है कोई

जब भी देखा है किसी प्यार का आँसू ‘जामी’
मैं ने जाना मेरे नज़दीक हुआ है कोई