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कोड़ों की सख़्त मार से, कन्धे तेरे / ओसिप मंदेलश्ताम

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»  कोड़ों की सख़्त मार से, कन्धे तेरे

कोड़ों की सख़्त मार से, कन्धे तेरे, प्रिया, होंगे लाल
तेज़ ठंड में भी नहीं जमेगा, ख़ून तेरा लेगा उबाल

तेरे ये नन्हें-नन्हें हाथ, कपड़ों पर फेरेंगे इस्त्री
तुझे बँटनी होगी रस्सी, उठानी होंगी कनस्तरी

कोमल नंगे पैरों से तुझे चलना होगा काँच पर
और रोज़ ही जलना होगा अंगारों की आँच पर

दिन-रात करूँगा याद तुझे मैं, पर दुआ नहीं कर पाऊँगा
वहाँ बिन तेरे, ओ सजनी मेरी, मैं शोक से मर जाऊँगा

रचनाकाल : मई 1934