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कोयला इतना काला नहीं होता / सांवर दइया

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तुम मेरा बार-बार अपमान मत करो
यह क्यों भूल जाते हो तुम
सहने की भी एक हद होती है ।

तुम्हारे इस थप्पड़ का जबाब
अब मैं दूंगा थप्पड़ से
(एक पर थप्पड़ खा कर
दूसरा गाल तुम्हारे सामने कर के
मैं गांधी बनना नहीं चाहता ।)

तुम्हारा टेरीकॉटन का सूट
बाटा के चमचमाते जूते
रंगीन टाई और चसमा
होगी फैशन इस युग की
लेकिन लट्ठे-डोवटी का कुर्ता और फायजामा
घिसे हुए तलवों वाली चप्पल
मैं भी पहने रखता हूं
(मैं निर्वस्त्र नहीं घूमता !)

चैम्बर में तुम्हारे घूमता है पंखा
घंटी बजाते ही
होता है हाजिर चपरासी
लेकिन सुनो !
मैं भी चार टांगों वाली कुर्सी पर बैठा हूं ।
(मैं बीच आकाश में नहीं लटका !)
तुम हर्षाते हो
कि तुम्हारे हस्ताक्षरों से
पास होता है मेरा वेतन-बिल,
लेकिन सुनो !
तीस दिन तक
खून-पसीना एक करने के बाद
मेरे आंगन में भी फुदकता है
पहली तारीख का सुख
(झूठा बखान कर बख्शीश लेने वाला
चारण-भाट मैं नहीं !)

माना तुम हीरे हो खरे
लेकिन मैं भी ‘कार्बन ग्रुप’ का हूं,
सुनो !
मैं कोयला हूं
पर याद रखना
कोई भी कोयला इतना काला नहीं होता
कि जलाने पर वह लाल नहीं हो ।


अनुवाद : नीरज दइया