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कौने रंग मुंगवा, कौने रंग मोतिया, हो कौने रंग ननदी तोरे बिरना? / मैथिली

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   ♦   रचनाकार: अज्ञात

उत्तरप्रदेश का अमर लोकगीत
फिल्म-- हीरा-मोती, सन् 1959
गायक-- सुधा मल्होत्रा और सुमन कल्याणपुर
संगीतकार-- रोशन

भाभी: कौने रंग मुंगवा,
कौने रंग मोतिया,
कौने रंग मुंगवा-कौने रंग मुंगवा,
कौने रंग मोतिया/ हो कौने रंग?
न न दी तोरे बिरना? हो, हो, हो, होजी।

ननद : सबज रंग मुंगवा, सफेद रंग मोतिया,
सबज रंग मुंगवा-सबज रंग मुंगवा,
सफेद रंग मोतिया/ हो सांवरे रंग- सांवरे रंग भा अ भी (भाभी) तोरे बिरना!
हो, हो, हो, होजी।

ननद : टूट गइले मुंगवा, बिखर गइले मोतिया,
टूट गइले मुंगवा-टूट गइले मुंगवा,
बिखर गइले मोतिया/ बिसर गइले- हाय,
बिसर गइले भाभी मोरे बिरना। हो, हो, हो, होजी।

भाभी : बीन लइबे मुंगवा, बटोर लइवे मोतिया,
बीन लइबे मुंगवा- बीन लइबे मुंगवा,
बटोर लइबे मोतिया/ मनाई लैबू- मनाई लैबू ननदी तोरे बिरना।
हो, हो, हो, होजी।

भाभी : कित सोहे मुंगवा,
कित सोहे मोतिया/ कित सोहे मुंगवा-कित सोहे मुंगवा,
कित सोहे मोतिया/ हो कित सोहे- हो कित सोहे ननदी तोरे बिरना।
हो, हो, हो, होजी।

ननद : सुंदरी सोहे मुंगवा,
बहुतइया सोहे मोतिया/ सुंदरी सोहे मुंगवा- सुंदरी सोहे मुंगवा,
बहतुइया सोहे मोतिया/ तिरिया सोहे- कि तिरिया सोहे भाभी मोरे बिरना। हो,
हो, हो, होजी।
अंत में दोनों बारी-बारी से 'हो हो' को उठाती हुई, गीत को समाप्त करती हैं।

००००

गीत का अर्थ –

भाभी पूछती है- ननदी, मूंगे का रंग कैसा होता है?
मोती का रंग कैसा होता है?
और बता तेरे भैया का रंग कैसा है?

ननद जवाब देती है- भाभी, मूंगा सब्जी के रंग का (यानी हरा) होता है?
मोती सफेद रंग का होता है। मेरे भैया का रंग सांवला है।
और फिर ननद ही कहती है- मूंगा टूट गया! मोती बिखर गया।
और मेरे भैया (बिरना) मुझे भूल गए!

इसके जवाब में भाभी बोलती है- मूंगे को बीन लूंगी।
मोती को बटोर लूंगी।
और, तुम्हारे भैया को मना लूंगी।

आगे फिर भाभी पूछती है- ननदी, मूंगा कहां शोभा देता है?
मोती कहां शोभा देता है?
और, बता, तेरे भैया को क्या शोभा देता है?

और ननदी जवाब देती है-

मूंगा अंगूठी में शोभा देता है।
मोती कंगन में शोभा देता है।
और हमारी प्यारी भाभी हमारे प्यारे भैया को शोभा देती है।
०००

टिप्पणी--यह अपने मूल में 'ननद-भौजाई' के बीच का गीत है। हाथ चक्की
(घट्टी) पर सुबह-सुबह गेहूं पीसते हुए घर की कोई भी दो महिलाएं इसे गाती
थीं, श्रम के भार को काटने के लिए या मन द्वारा उसे अनदेखा करने के लिए.
फिल्म में भी यह गीत नायिका और सहनायिका के बीच, उसी हाथ चक्की पर होता
दिखाया गया है।
ननद-भाभी गेहूं पीसती जाती हैं और सवाल-जवाब की शक्ल में गाती जाती हैं।
सुखद आश्चर्य यह कि संगीतकार रोशन ने गाने की पृष्ठभूमि में हाथ चक्की
चलने का सांगीतिक इफेक्ट भी दिया है, जिससे गीत और भी यथार्थ के करीब चला
जाता है। वह मीठा लगने के साथ-साथ जाने किन यादों से आँखें भी तर करता
है।
भाभी का हिस्सा सुमन गाती हैं और ननद के हिस्से को सुधा संभालती हैं।
यह गीत रेडियो पर खूब बजा था और अरसे तक इसकी फरमाइशें की जाती रही थीं।