भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

क्या खबर थी आतिशीं आब-ओ-हवा हो जाऊँगा / शीन काफ़ निज़ाम

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

क्या ख़बर थी आतिशीं आबो-हवा हो जाऊँगा
ख़ाक-ओ-खूं मुस्तकिल मैं सिलसिला हो जाऊँगा

इब्तिदा हूँ आप अपनी इन्तिहा हो जाऊँगा
बारिशों का कुर्ब पाकर फिर हरा हो जाऊँगा

झाड़ियों की उँगलियाँ लपकेंगी गर्दन की तरफ
पहली शब के आख़िरी पल की दुआ हो जाऊँगा

आसमां की सम्त उठेंगे बगूले और मैं
रफ़्ता-रफ़्ता इक मुक़ाम-ए-गुमशुदा[1] हो जाऊँगा

चिलचिलाती धूप में अपना सरापा देख कर
रात की तन्हाइयों का वसवसा[2] हो जाऊँगा

कुछ न कुछ खोता चला जाऊँगा इक-इक मोड़ पर
और फिर मैं एक दिन तेरा कहा हो जाऊँगा

खुरदुरे और खोखले बरगद का बाज़ू थाम कर
सुबहे-सीमीं[3] का मआले-तैशुदा[4] हो जाऊँगा

जब कोई झुकने लगेगा शाम की दहलीज़ पर
गुम्बदे-मोहूम[5] का मैं मुब्तना[6] हो जाऊँगा

फड़फड़ाते देखकर तारों में कफ़्तर को "निज़ाम"
उँगलियों की उलझनों में मुब्तला[7] हो जाऊँगा

शब्दार्थ
  1. खोया हुआ स्थान
  2. अनिष्ट की आशंका
  3. रजत प्रभात
  4. पूर्व निश्चित अंत
  5. गुम्बद जो केवल भ्रम भ्रम हो
  6. बुनियाद डाला हुआ
  7. ग्रस्त