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क्या भूल गए तुम / क्रिस्टीना रोजेटी

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क्या भूल गए तुम कि कैसे गर्मी की उस रात में,
टहल रहे थे हम दोनों ले चांदनी को साथ में,
जबकि हवा के गर्म झोंके हमें सुना रहे थे लोरियां?
क्या भूल गए तुम कि कैसे सराहा था तुमने अँधेरे और
रोशनी को; हां घबरा नहीं रहे थे पर नहीं थे बहुत सहज भी?
और कैसे कहा था तुमने कि चांद की चमक की जगह
भा रही है सितारों की टिमटिमाती रोशनी? पर बहुत जल्द ही,
तुम शर्माए और तुम्हारी बातों पर घूम गयी संदेह की सुई,
हम टहलते रहे थे बेपरवाह समय की सीमाओं से,
जब तक न चेताया हमें सुदूर चर्च की पहली घंटी की धुन ने,
हम मुड़े एकदम से और पहुँच गए हवा के परों पर होकर सवार,
घंटी की दूसरी धुन से ही पहले,
मगर क्या; क्या वाकई उन लम्हों को तुम गए हो भूल?
ओह, फिर मैं ही कैसे संजो सकी उन क्षणों की धूल?

मूल अँग्रेज़ी से अनुवाद : सोनाली मिश्र

और अब पढ़िए कविता मूल अँग्रेज़ी में
Have You Forgotten?

Have you forgotten how one Summer night
We wandered forth together with the moon,
While warm winds hummed to us a sleepy tune?
Have you forgotten how you praised both light
And darkness; not embarrassed yet not quite
At ease? and how you said the glare of noon
Less pleased you than the stars? but very soon
You blushed, and seemed to doubt if you were right.
We wandered far and took no note of time;
Till on the air there came the distant call
Of church bells: we turned hastily, and yet
Ere we reached home sounded a second chime.
But what; have you indeed forgotten all?
Ah how then is it I cannot forget?