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क्यों फ़ौजी, क्यों तुज्खे लगता है / निकोलस गियेन / गिरधर राठी

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क्यों फ़ौजी, क्यों तुझे लगता है
कि नफ़रत छुपी है मेरे भीतर,
अगर हम-तुम एक हैं वाक़ई,
मैं,
तू ।

तू है ग़रीब, मुझे देख ।
मैं आया तलछट से, सो तू भी ।
क्यों तुझे लगता है, फ़ौजी !
कि नफ़रत है मेरे भीतर ?
कचोटता है यह मुझे कभी-कभी
कि तू भूल जाता है, मैं हूँ मैं,
यार मेरे, मैं ही हूँ तू,
वैसे ही जैसे तू है मैं ।

बहरहाल, चाहे जो सोच
मुझे नहीं तुझ पर कभी भी मलाल
अगर तुम-हम एक हैं वाक़ई,
मैं,
तू,
तब फ़ौजी, क्यों तुझे लगता है
कि नफ़रत है मेरे भीतर छुपी हुई ?

जल्द ही मिलेंगे हम दोनों, मैं और तू,
चलेंगे साथ-साथ सड़कों पर,
कन्धे से कन्धा मिला, तू और मैं,
बिना किसी नफ़रत के, मैं और तू,
लेकिन बावस्ता, तू और मैं,
कहाँ हमें जाना है, मैं और तू ...

क्यों फ़ौजी, क्यों तुझे लगता है
कि नफ़रत छुपी है मेरे भीतर !

अंग्रेज़ी भाषा से अनुवाद : गिरधर राठी