भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

क्यों हो / नीना कुमार

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

इल्तेजा-ए-अँधेरा है, राज़ ज़ाहिर क्यों हो
हर शाम हो दरख्शां- ऐसा आखिर क्यों हो

उदास है शम्मा, यूँ परीशाँ ना करो अब
परवाने लौटा दो, आज हाज़िर क्यों हो

इक लुत्फ़-ए-सफ़र था, थी रहगुज़र-ए-उम्मीद
बज़्म-ए-मंज़िल खो गई, अब मुसाफिर क्यों हो

लमहा दर लमहा यूँ, बरसा बून्द बून्द है तनहा
कोई सावन की झड़ी फिर मेरी खातिर क्यों हो

है बेख़ुदी अब इस कदर और ख्वाबीदा है नज़र
कोई साहिल किसी सागर का मुन्तज़िर क्यों हो

एक वादा-ए-ज़िन्दगी में हो गिरफ्त ज़िन्दगी
ये फ़रेब-ए-मुस्तक़बिल[1] यूँ फिर फिर क्यों हो

कितने नाक़ाबिल-ए-ज़माना, 'नीना' तुम हो
ना समझ पाए के क़ातिल तेरा नासिर[2] क्यों हो

शब्दार्थ
  1. भविष्य का धोखा
  2. मददगार