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खज़ाना / अब्दुल्ला पेसिऊ

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मुखपृष्ठ  » रचनाकारों की सूची  » रचनाकार: अब्दुल्ला पेसिऊ  » खज़ाना

दुनिया जब से बनी है
तभी से
लगा हुआ है आदमी
कि हाथ लग जाए उसके
 
मोतियों के
सोने और चांदी के खज़ाने
सब कुछ
सागर तल से लेकर
पर्वत शिखर तक
 
पर मेरे हाथ लगता है बिला नागा
सुबह-सवेरे एक खज़ाना
मुझे दिख जाती हैं
आधी तकिया पर अल्हड़ पसरी हुई सलवटें।

अंग्रेज़ी से अनुवाद : यादवेन्द्र