भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

खण्ड-14 / सवा लाख की बाँसुरी / दीनानाथ सुमित्र

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

261
माँ से ऊँचा कौन है, इससे गहरा कौन।
पूछा, हिमगिरि चुप रहा, सप्तसिंधु था मौन।।

262
लूटनहारा लूटता, रख माथे पर हाथ।
दुनिया आँखें बंद कर, जिये लूट के साथ।।

263
यश, कंचन औ कामिनी, यह है आदिम भूख।
इसी भूख से है गई, प्रेम नदी सब सूख।।

264
नेताजी ने है किया, जीवन भर शृंगार।
दर्पण को देखा नहीं, सुनते जय-जयकार।।

265
वादों की फसलें बुने, स्वप्न दिखाये खूब।
जैसे ही गद्दी मिली, गई फसल सब डूब।।

266
बारी-बारी लूटते, सभी आस-विश्वास।
वह ही शोषक बन गया, सत्ता जिसके पास।।

267
चाँदी का चम्मच रखे, रखे स्वर्ण का थाल।
लाल टमाटर-से हुए, नेताजी के गाल।

268
कैसे होगा देश का, भैयाजी उद्धार।
पद लेकर बैठे हुए, कौए, गिद्ध, सियार।।

269
कुर्सी ही भगवान है, कुर्सी ही पहचान।
कुर्सी झट से भूलती, वीरों का बलिदान।।

270
पैसों पर बिकने लगे, राजनीति के शेर।
वही रहे सरकार में, जो हैं धनिक-कुबेर।।

271
सूर्य, अँधेरे से मिला, दिया रात का साथ।
नहीं रोशनी मिल रही, दिन हो गया अनाथ।।

272
संसद जबसे हो गया, काग, चील का ठाँव।
तबसे मरघट हो गए, विकसित होते गाँव।।

273
अरबपति नेता बने, नहीं भूख का मोल।
अंदर से शैतान हैं, चाहे उजले खोल।।

274
बगुले छुट्टा घुमते, मछली गई तिहाड़।
न्यायालय उसका हुआ, जिसके पास जुगाड़।।

275
प्रेम-पंथ का हो गया, अब पैसा आधार।
अब पैसों को देखकर, लैला करती प्यार।।

276
शेर सभी चुप हैं खड़े, गर्दन पर तलवार।
सत्ता पाकर कर रहे, हू-हू खूब सियार।।

277
चौपट है नगरी यहाँ, अंधा करता राज।
तब ही तो होता नहीं, कुछ विकास का काज।।

278
लोकपाल जी कर रहे, निज पद का उपयोग।
तुम खाओ हम खायगें, लगा रहे हैं योग।।

279
प्रेम, धर्म का मूल है, यह ग्रंथों का ज्ञान।
तू जिहाद करता नहीं, पढ़ता अगर कुरान।।

280
गीत, ग़ज़ल, दोहे लिखे, यही हुआ संसार।
नहीं मंच की कामना, मुझे काव्य से प्यार।।