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खण्ड-15 / सवा लाख की बाँसुरी / दीनानाथ सुमित्र

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281
पथ पर तुम आगे बढ़ो, मंजिल होगी पास।
कुँआ पास आता नहीं, लाख लगी हो प्यास।।

282
प्रेम कभी झुकता नहीं, सहकर अत्याचार।
मीरा, केशव की हुई, भूल सकल संसार।।

283
आओ हम मिलकर लिखें, सुख के दस्तावेज।
दुख को बाँटे, प्यार दें, सुख को रखें सहेज।।

284
बेकसूर के खून से, लथपथ है कश्मीर।
सत्ता ने कश्मीर की, लिखी अजब तकदीर।

285
गाँव-गाँव में जा रही, बड़े शहर की आग।
रिश्तों को डसने लगे, स्वार्थ, लोभ के नाग।।

286
मनसा, वाचा, कर्मणा, से जन-जन का मोल।
रूप, रंग कुछ है नहीं, यह तन है बस खोल।

287
सुबह-सवेरे जो उठे, करे सात्विक भोग।
उसको इस संसार में, छुए न कोई रोग।।

288
मोबाइल से हो रही, घर-घर सब की बात।
चिट्ठी अब कहती नहीं, मन-मन के जज्बात।।

289
आँखों से है दीखती, दुखी हृदय की पीर।
रोके से रुकता नहीं, इन आँखों का नीर।।

290
सुबह-सुबह करना भ्रमण, तन के है उपयुक्त।
मिलती जो ताजी हवा, रखे रोग से मुक्त।।

291
यदि हँसने के साथ हो, हर दिन की शुरुआत।
दिल की गति होती सबल, सहती हर आघात।।

292
कटु शब्दों को मत कहो, इसकी पैनी धार।
मन को यह घायल करें, ज्यों तन को तलवार।।

293
किसे नहीं संसार में, बता मान की चाह।
मगर कर्म है मान का, एक मात्र ही राह।।

294
धन पाने की चाह में, फैला घातक रोग।
भ्रष्टाचारी हो गये, जो थे सीधे लोग।।

295
मत समझो तुम शेर हो, हम बकरी के बाल।
मिल जायेंगे यार तो, छिल जायेगा खाल।।

296
देना है आशीष ही, लेना है आशीष।
व्यर्थ नहीं अभिमान में, अकड़ो अपना शीश।।

297
दर्शन तुम देते रहो, तुम ही हो अरमान।
मेरे मन की साधना, जीवन के भगवान।।

298
अधरों पर मुस्कान हो, आँखो में मुस्कान।
जीना फिर हो जायगा, दुनिया में आसान।।

299
बाल न बांका होयगा, अगर रहोगे साथ।
हो जाओगे सब सबल, अगर मिला लो हाथ।।

300
गद्दी-गद्दा छोड़ कर, चलिए जन के साथ।
जनता ही सरकार है, शासन जन के हाथ।।