भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

खण्ड-17 / सवा लाख की बाँसुरी / दीनानाथ सुमित्र

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

321
पूर्व मरण के जान लो, नहीं रटूँगा राम।
राम नाम तब ही सफल, जब हों अच्छे काम।।

322
जाना है परदेस अब, साथ न देना कोय।
चिंता मुझको है नहीं, जो होना सो होय।।

323
तेरी धरती है अगर, मेरा है आकाश।
मन यह बेपरवाह है, नहीं भूख या प्यास।।

324
नहीं किसी का कुछ लिया, क्यों हैं सब नाराज।
सब के सब बेताज हैं, कौन यहाँ सरताज।।
 
325
कहाँ खो गई चाँदनी, कहाँ छिप गया चाँद।
कहाँ खो गईं धड़कने, कहाँ गया उन्माद।।

326
माटी-माटी से मिली, मिली आग से आग।
नहीं मिटेगा विश्व से, प्रेम भरा अनुराग।।

327
साथ तुम्हारे हूँ सदा, चल चाहे जिस ओर।
तू अम्बर का चाँद है, मैं हूँ एक चकोर।।

328
साजन तेरे प्यार ने, दिल को दिया करार।
आओ बैठो साथ में, बैठेगा संसार।।

329
चंद्रग्रहण है लग गया, चलो नहाने गंग।
पाप कटेगा जन्म का, धुल जाएगें अंग।।

330
कोई पापी है नहीं, किया न कोई पाप।
जीवन जीना है कठिन, लाखों हैं संताप।।

331
विद्यालय नाशाद है, शौचालय है शाद।
बहुत जल्द हो जायगा, सकल मुल्क़ बर्बाद।।

332
आँसू में डूबा हुआ, है सारा संसार।
हँसना फिर भी चाहिए, सबको पल-पल यार।।

333
नेताजी फुसला रहे, खूब बनाते माल।
बुनते हैं दिन-रात वे, जाति, धरम का जाल।।

334
कहाँ छुपे हो कृष्ण जी, खोज रहे हैं नंद।
कंशराज ने कर दिया, गोकुल मथुरा बंद।।

335
बनिए की सरकार है, करे खूब व्यापार।
सेठ कमाते जा रहे, निर्धन हैं बेकार।।
 
336
अभिनंदन है आपका, करिए भारत बंद।
भारत माता बंद में, मना रही आनंद।।

337
बोतल नेतागण सभी, अधिकारीगण चंठ।
आमजनों का मौज से, दबा रहे हैं कंठ।।

338
फूलों की खेती बड़ी, माला बनी विशाल।
नेता मूर्खानंद की, गर्दन झूले माल।।
 
339
आरक्षण के वास्ते, लड़ो हमारे लाल।।
भारत बंद किए चलो, लुट जाने दो माल।।

340
नेता इक घोड़ा बने, जनता बने सवार।
देश बचेगा यह तभी, वरना हाहाकार।।