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खण्ड-20 / यहाँ कौन भयभीत है / दीनानाथ सुमित्र

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381
समय गुजरने में कभी, लगी नहीं है देर।
बहुत शीघ्र मिट जायगा, महाविकट अंधेर।।

382
जो होना था हो गया, जो होना हो जाय।
मेरा मन बलवान है, कभी नहीं घबराय।।

383
भारत में पैदा हुए, बड़े-बड़े विद्वान।
बात किसी की कब सुनी, बहरा हिन्दुस्तान।।

384
यह कागज का फूल है, यह है असल गुलाब।
जो लेना है लीजिए, मूरख नहीं जनाब।।

385
मत विष को अमृत कहो, जल को कहो न आग।
दूध पिलाते हो जिसे, वह है काला नाग।।

386
मैं कहता हूँ सुबह है, तुुम कहते हो शाम।
जो रावण है तुम उसे, क्यों कहते हो राम।।

387
जाति धरम के रास्ते, नहीं चलेगा देश।
सदा शुद्ध जनवाद का, जपा करो संदेश।।

388
सब के सुख को सोचिए, अपने दुख को भूल।
तभी बनेगा आपका, यह जीवन अनुकूल।।

389
जहाँ पहुच कर हँस रहा, चीन, फ्रांस, जपान।
कब पहुँचेगा रामजी, मेरा हिंदुस्तान।।

390
रखो प्रीत तुम फूल ले, सुनो पखेरू गान।
प्रकृति प्रेम से बनोगे, तुम असली इंसान।।

391
धन तो तन का मैल है, राजा दीनानाथ।
क्यों अभाव में यह मरे, जन-मन इसके साथ।।

392
पढ़ने का मतलब नहीं, होता सिर्फ किताब।
आगे पसरा है जहाँ, देखो जरा जनाब।।

393
दुनिया देखी, तब लिखे, मैंने गीत हजार।
इसीलिए दुनिया मुझे, करती इतना प्यार।।

394
पापा थक कर चूर हैं, मिला नहीं वर एक।
क्यों जग में मिलता नहीं, कोई बालक नेक।।

395
मैं कबीर के साथ हूँ, साथ रहे रसखान।
तुलसी बाबा साथ में, अपना सकल जहान।।

396
देखा संसद को नहीं, बस देखी तस्वीर।
इतनी मेरी चाह है, इसमें जायें वीर।।

397
बूढ़ी औरत बेचती, भरी टोकरी आम।
कितनी तीखी जिं़दगी, कितना मीठा काम।।

398
मेरा कुछ भी है नहीं, पर सारा संसार।
भरा खजाना प्रेम का, जो जीवन आधार।।

399
सड़क सरीखी ज़िंदगी, इसमें कितने मोड़।
मोड़-मोड़ पर जो मिले, उन्हें न पाया छोड़।

400
सँग में मेरे कुछ नहीं, जिस पर करुँ गुमान।
करुणामय रहता सदा, अन्तस का भगवान।।