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खण्ड-6 / यहाँ कौन भयभीत है / दीनानाथ सुमित्र

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101
नेताओं का मीडिया, नेता के अखबार।
गर्म कर रहे रोज ही, जुमलों का बाजार।।

102
हीरे की चर्चा नहीं, कंकर का जय गान।
गुरुओं के गुरु देश का, यही आज सम्मान।।

103
कलम हमारी कर रही, होली पर हुड़दंग।
नहीं किसी को छोड़ना, डारूँ हर तन रंग।।

104
जिसके दिल में है भरा, नव उत्साह-उमंग।
हुआ नहीं उसके कभी, मधुर रंग में भंग।।

105
दुख को झेलो प्यार से, दुख का होगा अंत।
हर पतझड़ के बाद में, आता फाग, बसंत।।

106
जीवन का त्यौहार है, होली का त्योहार।
रंगों से दिखला रहा, यह सदियों से प्यार।।

107
सिखलाता हमको यही, होली का त्योहार।
रंग-रंग जब-जब मिले, एक हुआ संसार।।

108
सज-धज के बारात ले, आया है मधुमास।
यही बुझायेगा सखे, तृषित नयन की प्यास।।

109
मानव-पूजा के लिये, भारत है विख्यात।
दूल्हे के सँग में यहाँ, रहती है बारात।।

110
ज्ञानी हों एम0 पी0 सभी, पी0 एम बने विदेह।
हो खुद की खातिर नहीं, जन की खातिर नेह।।

111
वोट उसीको दीजिए, जिसके पास चरित्र।
कसम आपको दे रहा, दीनानाथ सुमित्र।।

112
हारी जनता आजतक, जीता है बलतंत्र।
अब तो रटना छोड़िए, जाति-धर्म के मंत्र।।

113
घोड़े-गदहे माँगने, जब आयेंगे वोट।
तो तुम उनके पीठ पर, देना गहरी चोट।।

114
समता है आकाश में, उतरेगी जिस रोज।
कलम करेगी दोस्तों, उच्च किस्म का भोज।।

115
बीमारी का कह वहाँ, कैसे मिले इलाज।
आँगन को टेढ़ा जहाँ, कहता मिला समाज।।

116
चंदन वन है जल रहा, मरुथल में बरसात।
संग विसंगति समय के, रहती है दिन रात।।

117
आँसू की बरसात को, कैसे दूँ मैं रोक।
बिना बहे विष के सदृश, हो जायेगा शोक।।

118
दीप नहीं उसका बुझे, यदि मन में संकल्प।
साहस से जीते सभी, देख चुका हर कल्प।।

119
कहा प्यार ने कल मुझे, सुनलो मेरे यार।
रुपये से पॉकिट भरो, तब चलना बाजार।।

120
राजा का आदेश है, करो झूठ की बात।
कहो रात को नित दिवस, कहो दिवस को रात।।