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खण्ड-6 / सवा लाख की बाँसुरी / दीनानाथ सुमित्र

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101
गाने लगी मुंडेर पर, मीठे-मीठे गान।
कोयल के इस गान में, प्रीत भरी है तान।।

102
तन-मन में हल्दी चढ़ी, आया नवल निखार।
भ्रमर-कुसुम ने प्रीति को, किया हर्ष स्वीकार।।

103
महुआ-सरसों गंध में, मन हो गया विभोर।
पिया मिलन के ख्वाब में, नाच रहा मन मोर।।

104
प्रणय-पंथ की चाह है, आलिंगन की प्यास।
बेल पत्र पर लिख रही, पवन-प्रीति अहसास।।

105
पीर पपीहे की सुनी, जागे मन के बोल।
इच्छाएँ उकसा रही, सारे बंधन खोल।।
 
106
तन कर्तव्यों में दबा, मन जीता संन्यास।
एक मौज को भोगता, दूजा ज्यों वनवास।।
 
107
मन दौड़ा ही जा रहा, दूर गगन के पार।
मन को मिलती रौशनी, औ तन को अँधियार।।

108
छालों में पानी भरा, सूख गई है आँख।
जब बेटों ने काट दी, पितु-इच्छा के पाँख।।

109
आँखों में छाने लगा, चमक-दमक का ख्वाब।
जूते हैं शोरूम में, भू पर पड़े किताब।।

110
झट से मिलती राय है, नहीं मिले सहयोग।
सुख का साथी विश्व है, दुख का सिर्फ़ वियोग।।

111
मरे भूख से जिन्दगी, चुप बैठी सरकार।
हक की रोटी के बिना, जीते हैं हकदार।।

112
जब अपना मिलता नहीं, छलता है व्यवहार।
मन से तब यह फूटता, बुरा बहुत संसार।।

113
संभव उसके साथ में, नहीं निभाना यार।
मैं, मेरा से हो जिसे, केवल जग में प्यार।।

114
निर्धन को भोजन नहीं, प्रभु को छप्पन भोग।
कैसी-कैसी सभ्यता, चला रहे हैं लोग।।

115
दूजा क्या बतलायगा, खुद ही खुद को माप।
कितना करता पाप है, कितना करता जाप।।

116
सृष्टि बनी बारूद-घर, सबके हाथों आग।
खोया-खोया-सा लगे, प्यार और अनुराग।।

117
जिस बरगद ने कल तलक, बाँटी सब को छाँह।
आज उसी की काट ली, बेदर्दी ने बाँह।।

118
होली, दीवाली रुचे, भाये क्रिसमस, ईद।
पर मानवता का रहा, दीनानाथ मुरीद।।
 
119
मरते बेटे फौज में, बेटी लहुलूहान।
हाय-हाय कैसा हुआ, अपना हिन्दुस्तान।।
 
120
जाति-धर्म के शस्त्र से, काटे बढ़ते पैर।
कभी प्रगति देगा नहीं, आपस का यह बैर।।