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ख़ला की बून्द थी, फैली तो कायनात हुई / रवि सिन्हा

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ख़ला[1] की बून्द थी, फैली तो कायनात[2] हुई
ज़रा सी बात थी, फ़ित्ने[3] उठे, हयात[4] हुई

सुबह-ओ-शाम फ़राहम[5] हैं इस धुन्धलके में
अजीब मुल्क है ये दिन हुआ न रात हुई

हमीं वफ़ा करें, हम दें सुबूत भी उनको
वो’ ख़ल्क़ो-मुल्क[6] हैं उनकी ख़ुदा की ज़ात हुई

हक़ीक़तें सलासिल[7] और ख़्वाब में बाज़ार
असीरे-ज़ीस्त[8] की क्या क़ीमते-नजात[9] हुई

इसी ज़मीन से पैदा हुए हैं हम औ' तुम
कहें तो क्या कहें क्यूँ दिल मिले न बात हुई

मुझे न पूछ बाज़ीचा[10]-ए-इश्क़ की चालें
हज़ार मर्तबा अपनी यहीं पे मात हुई

ये’ खेल ज़िन्दगी ने बार-बार खेला है
जो’ डाल-डाल थे हम तो वो’ पात-पात हुई

तमाम हो गए हैं सारे जहाँ के सब अफ़्कार[11]
तभी हयात को अब फ़िक्र-ए-ममात[12] हुई

लहद[13] में पाँव थे लेकिन नज़र सितारों पर
सफ़र तमाम हो ऐसे जो’ अपनी रात हुई

शब्दार्थ
  1. शून्य (space, nothingness)
  2. सृष्टि (Universe)
  3. उपद्रव, झगड़ा (mischief, quarrel)
  4. ज़िन्दगी (life)
  5. मौजूद (existent)
  6. लोग और देश (people and country)
  7. ज़ँजीरें (shackles)
  8. ज़िन्दगी के क़ैदी (prisoners of life)
  9. मुक्ति (liberation)
  10. खेल (game)
  11. चिन्ताएँ (worries)
  12. मौत (death)
  13. क़ब्र (grave)