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ख़ला में ख़ाक के ज़र्रे फ़साद करते हैं / रवि सिन्हा

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ख़ला में ख़ाक के ज़र्रे फ़साद करते हैं
उथल-पुथल को जहाँ की निहाद[1] करते हैं

सुकून जब है शबो-रोज़ कुछ लड़ाई हो
उठा-पटक में बसर की मुराद करते हैं

उबाल ख़ून में आता है आज भी जब-तब
जदीदियत[2] से जदीदी जिहाद करते हैं

उन्हें अज़ीज़ हैं हम दोस्त हैं मिसाल हुए
मगर हमीं से वो गुप-चुप इनाद[3] करते हैं

नज़र यहाँ से तो आए था साफ़ मुस्तकबिल[4]
वो आन्धियों को बुला गर्दो-बाद[5] करते हैं

खिंचा हुआ हूँ कई सम्त[6] तो टिका हूँ मैं
मिरे वजूद के रेशे तज़ाद[7] करते हैं

जफ़ा ही शर्त्त थी दुनिया में कामयाबी की
कभी-कभी तो मगर तुझको याद करते हैं

शब्दार्थ
  1. स्वभाव (nature)
  2. आधुनिकता (modernity)
  3. दुश्मनी (enmity)
  4. भविष्य (future)
  5. धूल की आँधी (dust storm)
  6. तरफ़ (direction)
  7. अन्तर्विरोध (contradiction)