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ख़ामोश हूँ मुद्दत से नाले हैं न आहें हैं / सीमाब अकबराबादी

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ख़ामोश हूँ मुद्दत से नाले हैं न आहें हैं।
मेरी ही तरफ़ फिर भी दुनिया की निगाहें हैं॥

‘सीमाब’ गुज़रगाहे-उल्फ़त को भी देख आये।
बिगड़े हुए रस्ते हैं, उलझी हुई राहें हैं॥