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खाई से उठती आवाज / बाल गंगाधर 'बागी'

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अपने ज़मीनों के बंधुआ मजदूर थे
जेल भेजे जाते थे भले बेकुसूर थे
सारे उजाले मेरे घर के हड़पकर
दुनिया की नजर में चमकते वो नूर थे

हमारी संपत्ति के वो दौलतराम थे
फर्क था इतना साथ उनके कमान थे
कचहरी में उनका न फैसला था होता
सच था वही जो उनके बयान थे

कौर सर उठाया है उनकी फरमान पर
अकड़ती मूंछों के आन-बान-शान पर
कौन था हिम्मती जो काम पर न आए
गालियों से आए न उनके खलियान पर

मूंछें अक्सर हैं उनके क्यों गिरती
नारी इसी से घुट के है मरती
सामंती सोच उन घरों से नहीं निकलती
इसलिए औरत घर में दबके है रहती

इतिहास से गायब नारी की कहानी
सामंती पुरुषों की झूठी मनमानी
नहीं चाहते वो स्त्रीकाल आए
बने सामाजिक क्रांति की निशानी

जो अपने ही घर को दबाया हो इतना
स्त्री खाई में चले मुनस्मृति रचना
फिर लोग तोड़े न क्यों इसकी संरचना
काम हो जिसका सबका शोषण ही करना