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खिलाओ फूल, बिखेरो हंसी जिधर जाओ / 'हफ़ीज़' बनारसी

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खिलाओ फूल, बिखेरो हंसी जिधर जाओ
चमन से मिस्ले-नसीमे-सहर गुज़र जाओ

न मिल सकेगा जहाँ में मेरी नज़र का बदल
संवर सको तो इस आईने में संवर जाओ

तुम्हारी चारागरी का जहाँ में शुहरा है
कभी हमारे दिलों के भी ज़ख्म भर जाओ

हर इक मक़ाम है मौजे-बला के नर्गे में
कहाँ पनाह लो, जाओ तो किस के घर जाओ

अजीब हाल है हर सुबह लो जनम फिर से
जब आये शाम तो कमरे में अपने मर जाओ

तुम्हारे नाम से मंसूब मंजिलें होंगीं
ग़ुबार बन के रहे-शौक़ में बिखर जाओ

बहुत क़लील है ये फ़ुर्सत-ए हयात 'हफ़ीज़'
जो कर सको तो कोई नेक काम कर जाओ