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खुला आकाश भी था सामने माक़ूल मौसम था / डी. एम. मिश्र

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खुला आकाश भी था सामने माक़ूल मौसम था
मगर अफ़सोस है उड़ने का उसमें हौसला कम था

बहुत मुश्किल था करना फ़ैसला हम किस तरफ़ जाते
किसी के घर में ख़ुशियाँ तो किसी के घर में मातम था

कोई हलचल नहीं थी और सब ख़ामोश बैठे थे
कहीं पर धूप ज़्यादा थी, कहीं वातावरण नम था

किसी को गर समझना हो तो उसको पास से देखो
जिसे फ़़ौलाद समझा था वो रेशम से मुलायम था

उसी को मैं चला था आज अपनी शान दिखलाने
कि जिसके सामने रक्खा मेरे बचपन का एलबम था

करोड़ों नवजवानों को मगर कल ख़्वाब में देखा
किसी की जेब में कट्टा,किसी के हाथ में बम था

किसी सरकार के हाथों में ताक़त की कमी थी क्या
मगर चोरों, लुटेरों के कलेजे में कहाँ दम था