भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

खुला है झूठ का बाज़ार आओ सच बोलें / क़तील

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

खुला है झूठ का बाज़ार आओ सच बोलें
न हो बला से ख़रीदार आओ सच बोलें

सुकूत[1] छाया है इंसानियत की क़द्रों पर
यही है मौक़ा-ए-इज़हार आओ सच बोलें

हमें गवाह बनाया है वक़्त ने अपना
ब-नाम-ए-अज़मत[2]-ए-किरदार आओ सच बोलें

सुना है वक़्त का हाकिम[3] बड़ा ही मुंसिफ़[4] है
पुकार कर सर-ए-दरबार आओ सच बोलें

तमाम शहर में क्या एक भी नहीं मंसूर
कहेंगे क्या रसन-ओ-दार[5] आओ सच बोलें

बजा[6] के ख़ू-ए-वफ़ा[7] एक भी हसीं में नहीं
कहाँ के हम भी वफ़ा-दार आओ सच बोलें

जो वस्फ़[8] हम में नहीं क्यूँ करें किसी में तलाश
अगर ज़मीर है बेदार आओ सच बोलें

छुपाए से कहीं छुपते हैं दाग़ चेहरे के
नज़र है आईना बरदार[9] आओ सच बोलें

'क़तील' जिन पे सदा पत्थरों को प्यार आया
किधर गए वो गुनह-गार आओ सच बोलें

शब्दार्थ
  1. ख़ामोशी
  2. आन, उपाधि
  3. शासक
  4. निर्णायक
  5. रस्सी और फंदा
  6. न्याय संगत, उचित
  7. स्थिरता की आदत
  8. गुण, विशेषता
  9. धारक