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खोज / निरंजन श्रोत्रिय

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(समाचार पढ़कर कि एक 23 वर्षीय युवक ने कम्प्यूटर ज्ञान से तृप्त होकर इसलिये आत्म हत्या कर ली कि अब इस दुनिया में जानने के लिये बचा ही क्या है!)

सब कुछ पा चुकी इस दुनिया में
बहुत कुछ बचा है खोजने को

कुछ सुगंध गुम हुई अंधेरे के भीतर
या कि याद अपनी ठेठ बोली के ठेठ मुहावरे की
कोई सच जो समाया मुहल्ले की पापड़ बेलती औरतों की गप्पों में

मुन्ने की घुटनचाल में उलझा
टुकड़ा कोई बचपन का सिरहाने जिसके आती नींद गहरी
बूढ़ी आँखों को
गया बाहर दरवाजे के पहन सूट
तो लौटी आवाज़ केवल सवार घंटियों पर

समवेत स्वाद रोटियों का पकी साझी आंच पर तन्दूर की
चट कर गई संगीनें दहशत की
आवाज़ किसी बीज की घोट दी गई जो
सौंधी मिट्टी के गर्भ में

पहाड़ा तेरह का कठिन जो हुआ याद
दबाते हुए पैर पिता के
हवाले अंततः फ्लापी के
कुछ पल बेशकीमती फुरसत के
सोखे जो विज्ञापन-गीतों की गुनगुनाहट ने
बिछाकर बाजार घर में

सदाशयता ‘कोई बात नहीं’ की मुस्कुराहट की
टकरा जाने पर अनायास
गुम हुई जो न मिली आज तक

हुए कुछ ज़रुरी सवाल कैद
उस गाड़ी में बख़्तरबन्द
जिस पर लिखी इबारत इनामी क्विज की

जबकि मनुष्य की अनिवार्य आकांक्षाएं बदल दी गई हैं
कम्प्यूटर की ‘बेसिक लैंग्वेज’ की बाइट में
जो करती बयां स्क्रीन पर/ धुंधला चेहरा कोई
खोजता हूं --धडकन अविकल!