भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

गंगा माई, गाडू रिंग्या ओद / गढ़वाली

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

   ♦   रचनाकार: अज्ञात

गंगा माई, गाडू[1] रिंग्या[2] ओद,
गंगा माई, इनी मातमी माई,
त्वैन उत्पइ लिने, हिमालै का गोद।
गंगा जी, रीटी जाली काई,
विष्णु चरण से छूटी, शिव जटा समाई।
गंगा माई, इनी मातमी माई, शिव जटा समाई!
गंगा जी, रीटी जाली काई,
शिव जटान छूटे, मृत्यु मंडल आई!
गंगा माई, इनी मातमी माई, मृत्यु मंडल आई!
गंगा जी, तराजू का झोका,
तेरी जातरा[3] औंदा, देसू-देसू का लोका।
गंगा जी, अखोडू की साई,
सोवन की जटा माता, मोती भरी ले बाँही!
गंगा माई, इनी मातमी माई, मोत्यों भरी ले बांही।
आँगड़ा की तणी, गंगा जी,
आग-आग चले माता, पीछ-पीछ हीरों की कणी।
गंगा जी, लमडाई लोड़ी,
आग आग चले माता, पीछ-पीछ गौ की जोड़ी।
गंगा माई, इनी मातमी माई, पीछ गौ की जोड़
गंगा जी मँडवा की माणी,
चाँदी सी चलक माता, सुहाग-सी स्वाणी।
गंगा माई इनी मातमी माई, सुहाग सी स्वाणी!
गंगा जी, कागजू की स्याई,
भगतू का खातर माता, मृत्यु मंडल आई।
गंगा जी, औंलू को अचार,
पंचनाम देव माता, करदा जै-जैकार।
गंगा माई, इनी मातमी माई, करदा जै-जैकार।

शब्दार्थ
  1. नदियों
  2. घूमी
  3. यात्रा