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गर्वोक्ति / सुकुमार राय

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पेड़ की जड़ में छेद बनाकर
रहते मेढक भाई,
उस दिन रौ में गाल फुलाकर
लम्बी तान लगाई।
सजा-बजा राजा का हाथी
मस्त झूमता आया,
"अरे बाप! " चिल्लाकर दुबके
अपने बिल में भाया।
एक तो हाथी, फिर राजा का
उसकी बातें न्यारी
बिना बात का गुस्सा आया
तोड़ी मोटी डाली।
पेड़ की चोटी पर बैठी गौरैया
तो हैरान
"एक अदद हाथी के अन्दर
इतनी होती जान?"
सिर निकालकर ज़रा-सा बाहर
बोले मेढकराज,
"भाई, हम सब चतुष्पदों का
है ही यही मिज़ाज।"

सुकुमार राय की कविता : बड़ाई (বড়াই) का अनुवाद
शिव किशोर तिवारी द्वारा मूल बांग्ला से अनूदित