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गांव गी लुगाईयां / राजेन्द्र देथा

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जद म्हारै गांव री लुगाईयां माथै
रची जावै ही कविता,कहाणी
अर लघुकथावां,
ठीक उण बखत ईज ऐ तीनूं विधावां
गूंगी बैठ'र दुखी होवै ही।
आखरां नै झाल'र
ठूंस्या जावै हा
मात्रवां रोवै ही
अनूस्वार माथौ झाल'न बैठा हा

अर बिनै कविता लिखणिया कविसरां
अर कवैतरियां खोल दिया हा
आपगी कार गा सीट बैल्ट
आभै रै आड़ंग रै मुजब
अर वांनै पूगणौ हो किणीं
वरिष्ठां रै बताऐ पत्ते रात रै भोज माथै
अर इनै सुगणी नै चाणचक बतायौ किणी कै-
थारै माथै लिखिजण जा री है कवितांवा,कहाणी

सुगणी किणरी नीं सुणै
आपरै सूड़ करण मांय वैस्त रेवै
कांईं ठा उणनै बड्डा आलैचकां रै
बखाण्यौडी पुरस्कार आली कवितावां
भली क्यूं नीं लागै

"किण कनै इण बात रौ पडूतर है?