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गिर्यां हैं अब्र-ए-चश्‍म मेरी अश्‍क बार देख / वली दक्कनी

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गिर्यां हैं अब्र-ए-चश्‍म मेरी अश्‍क बार देख
है बर्क़ बेक़रार, मुझे बेक़रार देख

फि़रदौस देखने की अगर आबरू है तुझ
ऐ ज्‍यू पी के मुख के चमन की बहार देख

हैरत का रंग लेके लिखे शक्‍ल-ए-बेख़ुदी
तेरे अदा-ओ-नाज़ को मा'नी निगार देख

वो दिल कि तुझ दतन के ख़यालाँ सूँ चाक था
लाया हूँ तेरी नज्र बहा-ए-अनार देख

ऐ शहसवार तू जो चला है रक़ीब पास
सीने में आशिक़ाँ के उठा है ग़ुबार देख

तेरी निगाह ख़ातिर-ए-नाज़ुक पे बार है
ऐ बुलहवस न पी की तरफ़ बार-बार देख

तुझ इश्‍क़ में हुआ है जिगर ख़ून-ओ-दाग़दार
दिल में 'वली' के बैठ के ओ लाला ज़ार देख