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गीत 10 / आठवाँ अध्याय / अंगिका गीत गीता / विजेता मुद्‍गलपुरी

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ई अव्यक्त जगत क्षणभंगुर, ऊ अव्यक्त अविनाशी
ई अव्यक्त जगत जड़ जैसन, ऊ घट-घट के वासी।

ऊ अव्यक्त अपर अविनाशी
कहवै सत्य सनातन,
परम विलक्षण दिव्य पुरुष ऊ
प्रज्ञ-पुराण-पुरातन,
नसवै जग सौ बार, न नशवै ब्रह्म सकल सुख रासी।

महाप्रलय में
जगत-अधिष्ठाता नै कभी नसावै,
जे अव्यक्त और अक्षर छै
क्षरण के गति नै पावै,
पार्थ, परम गति के स्वरूप ऊ शाश्वत परम उदासी।

हौ अक्षर अव्यक्त भाव के
जगत परम गति जानै,
जे पावै अव्यक्त भाव के
से हमरा पहचानै,
पावै हमरोॅ परम धाम के, संत-सिद्ध-संन्यासी
ई अव्यक्त जगत जड़ जैसन, ऊ अव्यक्त अविनाशी।