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गीत 10 / सातवाँ अध्याय / अंगिका गीत गीता / विजेता मुद्‍गलपुरी

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बुद्धिहीन प्राणी हमरा सामान्य मनुष सन जानै
हमरोॅ अविनाशी स्वरूप के, जे न कभी पहचानै।
विषय-वासना के दलदल में
जिनकर चरित धसल छै,
तर्क जाल में जिनकर मन
बुद्धि बेभाँज फँसल छै,
से निरबुधिया परमेश्वर के भी मनुष्य सन मानै।
अलख-अजन्मा-चिदानन्द हम
हम घट-घट वासी छी,
हम अव्यक्त-अरूप-अलौकिक छी
अज-अविनाशी छी,
मूढ़ समान्य मनुष्य सन हमरोॅ जन्म अेॅ मृत्यु बखानै।
अपन योग माया के अन्दर
हरदम छिपल रहै छी,
और अपन संकल्प हेतु हम
अपनो से प्रकटै छी,
अज्ञानी हम परमेश्वर के, मूल स्वरूप न जानै।
जे जन हमरोॅ गुण प्रभाव में
हरदम श्रद्धा रखै छै,
से हमरोॅ लीला के समझै
से हमरा जानै छै,
हम अविकारी के अज्ञानी परम विकारी मानै
बुद्धिहीन प्राणी हमरा सामान्य मनुष सन जानै।