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गीत 11 / आठवाँ अध्याय / अंगिका गीत गीता / विजेता मुद्‍गलपुरी

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ईश्वर के पाना छै अर्जुन, परम भक्ति से सम्भव
नित ईश्वर के भजन बिना छै भगवत् भक्ति असम्भव।

जे परमेश्वर के अंतर्गत
हय जग संचालित छै,
जे सच्चिदानन्द घन से
सम्पूर्ण जगत पालित छै,
आवागमन मिटै जीवन के, उनका बिना न सम्भव।
हे अर्जुन, जै काल में योगी
अपन देह त्यागै छै,
और देह में नै लौटै वाला
गति के पावै छै,
सेहो कहवौ कैसें होय छै, देह में आना सम्भव।
जे पथ में कि ज्योतिर्मय छै
देह अग्नि अभिमानी,
दिन के आरो शुक्ल पक्ष
उत्तायण के जे मानी,
हय पथ के योगी जन लेली ब्रह्मलोक छै सम्भव।
कहवै योगी सत्य लोक
साकेत लोक के वासी,
ब्रह्मलोक-गोलोक और
बैकुण्ठ लोक के वासी,
उत्तायण में गमन करै, उनके लेॅ हय छै सम्भव
नित ईश्वर के भजन बिना छै भगवत् भक्ति असम्भव।