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गीत 12 / चौथा अध्याय / अंगिका गीत गीता / विजेता मुद्‍गलपुरी

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द्रव्य यग करवै गृहस्थ जन
बनवै कूप-तलाब-धरमथल, धन्य करै निज जीवन।

रोगी-दुखी-अनाथ-भिखारी जन के अन धन दायक
भूखा-नंगा अरु अपंग के सहजें बनै सहायक
अन्न-वस्त्र-जल-औषध-पुस्तक करै भाव से अर्पण
द्रव्य यग करवै गृहस्थ जन।

कवि-गुरु-संत-वैद्य-ज्योतिष के करै मान जे अर्पण
भूमि-वस्त्र-गौ-पुस्तक-अन-धन सादर करै समर्पण
करै समर्पित इष्ट देव के, आप करै तब सेवन
द्रव्य यग करवै गृहस्थ जन।

और करै तप यग, तपै, आपन इन्द्रिय के साधै
परहित खातिर कष्ट सहै, ईश्वर के सदा अराधै
सहै धूप-बरसात-जार सब, करै कृष्ण उच्चारण
द्रव्य यग करवै गृहस्थ जन।