भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

गीत 15 / नौवाँ अध्याय / अंगिका गीत गीता / विजेता मुद्‍गलपुरी

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

जौने भजन महातम जानै
हम नै उनकर दोष गिनै छी, संत जकाँ छी मानै।

भले दुराचारी हो, सब तजि हमरोॅ नाम भजै छै
अडिग रहै निश्चय हमरा पर, साधक जकाँ छजै छै
हमर भजन से उत्तम जग में आन वस्तु नै मानै
जौने भजन महातम जानै।

संस्कार गत दुर्जन हमरोॅ नाम भजन नै पावै
पावै जों सदसंत के संगत, हमर नाम अपनावै
जानै हमरोॅ गुण रहस्य के और भजन व्रत ठानै
जौने भजन महातम जानै।

जिनकर दुषित आचरण, जिनकर खान-पान भठलोॅ छै
चाल-चलन से भ्रष्ट और सतमारग से हँटलोॅ छै
जे आदत से छै लचार, सद्संत के नै पहचानै
जौने भजन महातम जानै।

हमरोॅ भगत दुराचारी नै, सब विधि साध कहावै
हमरोॅ भजन करै हिय से जे, सहजे हमरा पावै
जिनकोॅ बुद्धि-विचार नास्तिक, से विपरीत बखानै
जौने भजन महातम जानै।