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गीत 20 / चौथा अध्याय / अंगिका गीत गीता / विजेता मुद्‍गलपुरी

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ज्ञान रूप नौका से प्राणी पाप समुन्दर पार करै
और ज्वलित अग्नि ईंधन के सहज जलावी छार करै।

हे अर्जुन, जे हमर सखा छिक
से न कहावै पापी
पावै ज्ञान तरणि सहजे ऊ
कोसै लागे तदापि
उनकर अन्दर कर्म बोध के, ज्ञान अग्नि संहार करै
ज्ञान रूप नौका से प्राणी पाप समुन्दर पार करै।

जनम-जनम के संस्कार के
सहजेॅ ज्ञान नसावै
पूर्वजन्म के संचित फल
नै परालब्ध बनि आवै
तत्त्व ज्ञान इन्द्रिय अरु मन-बुद्धि के सकल विकार हरै
ज्ञान रूप नौका से प्राणी पाप समुन्दर पार करै।

ज्ञान समान पवित्र न कुछ भी
करै जीव के पावन
ज्ञान अग्नि छिक जनम-जनम के
सब दुख-दोष नशावन
अन्तःकरण पवित्र करै अरु मन के सब कुविचार हरै
ज्ञान रूप नौका से प्राणी पाप समुन्दर पार करै।