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गीत 3 / अठारहवां अध्याय / अंगिका गीत गीता / विजेता मुद्‍गलपुरी

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यग-दान-तप हे अर्जुन, सब जन के करना चाही
और कर्मफल के इच्छा किनको नै करना चाही।
हय हमरोॅ उत्तम मत छै
श्रुति एकरे त्याग कहै छै,
अहंकार-ममता-आसक्ति
उगतें त्याग नशै छै,
कभी कामना के घनचक्कर में नै परना चाही।
पर, हे अर्जुन, नियत कर्म के
त्याग न करना चाही,
दैनिक क्रिया, दान-यग-तप
अध्यन नित करना चाही,
एकरोॅ त्याग छिकै तामस गुण, गूढ़ समझना चाही।
सकल कर्म के जे प्राणी
दुख के कारण समझै छै,
दैहिक दुख के कारण
जे जन अपनौ कर्म तजै छै,
हय राजस गुण छिक एकरा से सब के बचाना चाही।
वर्ण-आश्रम अरु स्वभाव-गुण
नै त्यागै के चाही,
व्रत-उपवास और संयम से
अनुरागै के चाही,
तजि सत्कर्म, निसिद्ध कर्म में कभी न परना चाही
यग-दान-तप हे अर्जुन, सब जन के करना चाही।