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गीत 4 / ग्यारहवां अध्याय / अंगिका गीत गीता / विजेता मुद्‍गलपुरी

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संजय उवाच-

कहलन संजय, हे राजन अब कृष्ण स्वरूप बढ़ैलन
देख रहल छी, अर्जुन के जे दिव्य रूप दिखलैलन।

कृष्ण महायोगेश्वर जे
सब जन के पाप हरै छै,
सब विशेष वस्तु के जौने
अधिक विशिष्ट करै छै,
परम ऐश्वर्ययुक्त कृष्ण अब दिव्य रूप अपलैलन।

मुँह अनेक, अनेक आँख छै
अद्भुत दर्शन वाला,
दिव्य विभूषण युक्त अंग छै
और दिव्य छै माला,
कोटि बाहु में भाँति-भाँति के दिव्य अस्त्र जे धैलन।

दिव्य गंध के लेप देह पर
अंग-अंग सोहै छै,
सब-टा अचरज युक्त
असिम छै, सब दिश मुख सोहै छै,
देख रहल अर्जुन अचरज से रूप कृष्ण जे धैलन
देख रहल छी अर्जुन के जे दिव्य रूप दिखलैलन।