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गीत 7 / तेरहवां अध्याय / अंगिका गीत गीता / विजेता मुद्‍गलपुरी

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सब इन्द्रिय के विषय के जानै, लेकिन सब से परे रहै
आसक्ति तजि सब कुछ धारै, निर्गुण भेॅ केॅ सगुण रहै।

बिन पग के जे चलै भुवन भर
बिन कर के सब काज करै,
बिन नयन के सब जग देखै
अरु बिन मुख के स्वाद चखै,
आसक्ति नै धरै जगत के, किन्तु जगत में व्याप्त रहै।

पूर्ण चराचर जग में व्यापित
बाहर-भीतर वास करै,
आप चराचर रूप ब्रह्म छिक
जग में सदा प्रकाश करै,
सूक्ष्म रूप के सब नै जानै, जे समीप अरु दूर रहै।

जैसे कि हिमखण्ड के जानोॅ
बाहर-भीतर जलमय छै,
वैसें ही सम्पूर्ण जगत में
वास करै नित ईश्वर छै,
जैसे सूर्य किरण में परमाणु कण बनि जल वास करै
सूक्ष्म रूप के सब नै जानै, किन्तु जगत में वास करै।