भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

गीत 8 / चौदहवां अध्याय / अंगिका गीत गीता / विजेता मुद्‍गलपुरी

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

द्रष्टा, केवल हमरा जानै
तीनों गुण से परे, न कर्ता आरो केकरो मानै।

जे हमरोॅ सच्चिदानन्द घन रूप तत्त्व जानै छै
कर्म फलोॅ से पृथक, हृदय में साक्षी भाव आनै छै
अपना के नै कर्ता, अपना के न भोक्ता मानै
द्रष्टा, केवल हमरा जानै।

तीनों गुण से परे, सच्चिदानन्द एक अविकारी
जे निर्गुण अरु निराकार छै, सब जग मंगलकारी
द्रष्टा हौ सच्चिदानन्द मय, सब अग-जग पहचानै
द्रष्टा, केवल हमरा जानै।

तीनों गुण के करै उल्लंघन, देह भाव नै आनै
जनम-मरण, यौवन-वृद्ध, दुख-सुख, सब टा के सम जानै
हमरोॅ परमानन्द रूप के, से सहजे पहचानै
द्रष्टा, केवल हमरा जानै।