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गुलाब / कैलाश मनहर

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गुलाब को नहीं जानते आप
और वह भी आपको नहीं जानता
और सच्चाई तो यह है कि
मैं भी पूरी तरह नहीं जानता
गुलाब के बारे में क्योंकि
वह मौक़ा ही नहीं देता जानने का

गुलाब ढोलकिया है हमारे इलाके का नामी

वह रतजगे और जागरण में भी ढोलक बजाता है और
कव्वालों और हिजड़ों के साथ भी ढोलक बजाता है

हनुमान जी के मन्दिर में भी ढोलक बजाता है गुलाब
और पीर के चिल्ले पर भी बजाता है हर शुक्रवार

गुलाब ढाढ़ी है
गुलाब मिरासी है

पाँचों वक़्त की नमाज़ पढ़ता है गुलाब और
सुबह जागते ही
गायत्री मन्त्र बोलते हुये सूर्य को हाथ जोड़ता है

मुसलमानों से मिलते समय अस्सलाम वालेकुम बोलता है गुलाब
हिन्दुओं से मिलता है तो हाथ जोड़कर राम राम करता है

गुलाब रोज़े रखता है पूरे महिने भर तक और
पूरे महिने ही कार्तिक स्नान करता है हर वर्ष

गुलाब के बच्चे गायें चराते हैं दिनभर बस्ती वालों की
और "तेरी भूरी भी चराई, तेरी काली भी चराई" गाते हुए
हर महिने उगाही करने जाते हैं घर-घर जबकि
गुलाब की पत्नी ढप बजाते हुए बधावे गाने जाती है
सगाई ब्याह और जलवा माण्डले के मौकों पर यजमानों के

गुलाब ईद पर नए कपड़े पहनकर ईदगाह जाता है
दीवाली पर नए कपड़े पहनकर दीपक जलाता है गुलाब

होली पर रंग खेलता है
मुहर्रम पर मर्सिया गाता है

गुलाब हर साल अलीबख़्शी ख़याल देखने जाता है बहरोड़
और भट्ट जी का तमाशा देखने आमेर भी जाता है अक्सर

गुलाब लुँगी बाँधता है चौख़ाने वाली रेशमी
गुलाब दो लाँग की सूती धोती पहनता है

गुलाब वसन्त पँचमी के दिन सरसों के फूल लेकर आता है
इदुल फितर पर गुलाब की पँखुड़ियाँ बाँटता है घर-घर में

आप गुलाब को नहीं जानते
और वह भी आपको नहीं जानता
और मैं जो उसके बारे में इतना जानता हूँ तो भी
मुझे पता नहीं पक्के तौर पर कि
वह गुलाब खाँ है या गुलाबचन्द
अथवा गुलाब मोहम्मद है या गुलाबराम

गुलाब मुझे साँझे हिन्दुस्तान की सच्ची विरासत लगता है