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गेट खोलते जाकर / धूर्जटि चटोपाध्याय / कंचन कुमार

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भूख की जलन से
हारान की बीवी मरने गई थी ।

अन्धेरे में
दोनों हाथों से पकड़
हारान ने कहा था —
इस बोसे से ही
रात गुज़ार दे,
कल
कारख़ाने का गेट खुलेगा ।

उसके बाद
चार महीने तक
सूखा बच्चा पेट में लिए
बीवी ज़िन्दा रही,
कारख़ाने का गेट नहीं खुला ।

पिछले आश्विन में
सीने की बीमारी से
हारान मर गया ।

पौष में मरी उसकी बीवी
आत्महत्या नहीं,
पुलिस की गोली से —
बन्द कारख़ाने का गेट खुलवाने की
कोशिश करते हुए ।

1971
मूल बांग्ला से अनुवाद : कंचन कुमार